मंगलवार, 9 अगस्त 2016

भक्त शिरोमणि करमा बाई की कहानी

राजस्थान के कई स्थानों पर एक भजन बहुत मशहूर है-
 थाळी भरके ल्याई रे खीचड़ो, ऊपर घी की बाटकी।
 जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावै बेटी जाट की।।
इस भजन में करमा का जिक्र किया गया है जिसके हाथ से बना खीचड़ा खाने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण भी दौड़े चले आए थे। 

भक्त शिरोमणि करमा बाई 
 जब-जब भगवान कृष्ण का उल्लेख आता है, करमा का नाम भी आ ही जाता है।
वे भगवान की महान भक्त थीं और कृष्ण ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए थे। 

राजस्थान के नागौर जिले की मकराना तहसील में एक गांव है- कालवा। इस गांव में जीवनराम डूडी के घर 1615 में एक बेटी का जन्म हुआ। भगवान की बहुत मन्नतें मांगने के बाद इसका जन्म हुआ था। नाम रखा- करमा। करमा के चेहरे पर एक अनोखी आभा थी। बचपन से ही उसमें भक्तिभाव के संस्कार थे।
जीवनराम स्वयं भी धार्मिक पुरुष थे और वे अपनी बेटी से बहुत स्नेह रखते थे। इसी माहौल में करमा 13 साल की हो गई। एक बार जीवनराम को कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए पुष्कर जाना था। उनकी पत्नी भी उनके साथ जा रही थी। वे करमा को भी साथ ले जाना चाहते थे लेकिन एक समस्या आ गई। उनकी अनुपस्थिति में भगवान को भोग कौन लगाता? इसलिए उन्होंने करमा को यह जिम्मेदारी सौंपी और बोले- बेटी, हम दोनों पुष्कर स्नान के लिए जा रहे हैं। तुम सुबह भगवान को भोग लगाना और उसके बाद ही भोजन करना।

अगले दिन करमा ने क्या किया
करमा ने यह जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार कर ली। इधर मां-पिता तीर्थ यात्रा के लिए रवाना हुए, उधर घर पर करमा ने सुबह स्नान आदि कर बाजरे का खीचड़ा बनाया। उसमें खूब घी डाला और पूजा के लिए भगवान की मूर्ति के पास आ गई। थाली सामने रखी और हाथ जोड़कर बोली, हे प्रभु, भूख लगे तब भोग लगा लेना, तब तक मैं घर के और काम कर लेती हूं।
इसके बाद वह काम में जुट गई। बीच-बीच में वह थाली देखने आती लेकिन भगवान ने खीचड़ा नहीं खाया। थाली वैसी ही रखी हुई थी जैसी करमा कुछ देर पहले छोड़कर गई थी।
काफी देर होने के बाद भी जब भगवान ने भोग नहीं लगाया तो उसे चिंता हुई। क्या खीचड़े में घी की कमी रह गई या थोड़ा और मीठा होना चाहिए था? उसने और गुड़ व घी मिलाया और वहीं बैठ गई। लेकिन भगवान ने फिर भी नहीं खाया। तब उसने कहा, हे प्रभु आप भोग लगा लीजिए। मां-बापू पुष्कर नहाने गए हैं।
आपको जिमाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई है। इसलिए आपके भोग लगाने के बाद ही मैं खाना खाऊंगी। लेकिन भगवान फिर भी नहीं आए। फिर करमा उनसे शिकायत करने लगी...

करमा की शिकायत
वह बोली, मां-बापू जब जिमाते हैं तो भोग लगा लेते हो और आज इतनी देर कर दी! खुद भी भूखे बैठे हो और मुझे भूखी रखोगे। लेकिन भगवान फिर भी नहीं आए और करमा का खीचड़ा वहीं रखा हुआ था। करमा ने और इंतजार किया।
फिर बोली- तुम्हें मेरे हाथ से ही खीचड़ा खाना होगा। मां-बापू को आने में कई दिन लग जाएंगे। तुम जीम लो, वरना मैं भी भूखी ही रह जाऊंगी।

करमा का खीचड़ा खाने आए कन्हैया
दोपहर बीत गई, शाम होने लगी थी, लेकिन करमा ने कुछ भी नहीं खाया। आखिरकार कृष्ण को आना ही पड़ा और बोले, करमा, तुमने पर्दा तो नहीं किया! ऐसे भोग कैसे लगाऊं? यह सुनकर करमा ने अपनी ओढऩी की ओट की और उसी की छाया में कृष्ण ने खीचड़े का भोग लगाया। थाली पूरी खाली हो गई।
करमा बोली, भगवान इतनी-सी बात थी तो पहले बता देते। खुद भी भूखे रहे और मुझे भी भूखी रखा। इसके बाद करमा ने खीचड़ा खाया। अब तो रोज करमा खीचड़ा बनाती है और कृष्ण उसका भोग लगाने आते।
जब तक करमा के मां-पिता तीर्थ-यात्रा पर रहे, रोज यह सिलसिला चलता रहा। कुछ दिनों बाद दोनों पुष्कर से घर लौटे। देखा, जाते समय तो मटका पूरा गुड़ से भरा था। अब खाली कैसे? उन्होंने करमा को बुलाया और पूछा, बेटी, गुड़ कहां है?
करमा ने बताया कि रोज भगवान कृष्ण उसके पास आते और खीचड़े का भोग लगाते। कहीं मिठास कम न हो जाए, इसलिए खीचड़े में गुड़ कुछ ज्यादा डाल दिया। उसने पहले दिन हुई परेशानी के बारे में भी बता दिया।
यह सुनकर माता-पिता चकित रह गए। जिस ईश्वर के लिए वे तीर्थ-यात्रा करने गए थे, जिसे लोग न जाने कहां-कहां ढूंढ़ रहे हैं, उसे उनकी बेटी ने अपने हाथ से खीचड़ा जिमाया!
यह कैसे संभव है? उन्हें चिंता भी हुई कि बेटी बावली तो नहीं हो गई है। उन्होंने मन को दिलासा देने के लिए कहा शायद करमा ही पूरा गुड़ खा गई होगी। इस पर करमा ने कहा, अगर आपको यकीन नहीं है तो कल देख लीजिए। मैं खुद भगवान को भोग लगाऊंगी।
दूसरे दिन करमा ने खीचड़ा बनाया। गुड़ और घी डालकर थाली मंदिर में रख दी। ओढऩी से पर्दा किया और प्रार्थना की - हे ईश्वर, मेरे सत्य की रक्षा करना अब आपके हाथ में ही है।
भक्त की पुकार सुनकर भगवान का सिंहासन डोल गया और कृष्ण खीचड़ा खाने आ गए। जीवनराम और उनकी पत्नी यह दृश्य देखकर विस्मित थे। उसी दिन से करमा बाई जगत में विख्यात हो गईं।
जीवन के अंतिम दिनों में करमा बाई भगवान जगन्नाथ की नगरी चली गईं और वहीं रहने लगीं। वहां रोज भगवान को खीचड़े का भोग लगातीं और भगवान उनके हाथ से खीचड़ा खाने आते। आज भी भगवान जगन्नाथ को खीचड़े का ही भोग लगाया जाता है।

करमा बाई की भक्ति का प्रतीक प्रसिद्ध भजन

करमा बाई की भक्ति का प्रतीक प्रसिद्ध भजन


थाळी भरके ल्याई रे खीचड़ो, ऊपर घी की बाटकी।
जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावै बेटी जाट की।।
बाबो म्हारो गांव गयो है, कुण जाणै कद आवै लो।
बाबा कै भरोसै सांवरा, भूखो ही रह ज्यावै लो।।
आज जीमावूं तन्नैं खीचड़ो, काल राबड़ी छाछ की।
जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावै बेटी जाट की।।
बार-बार मंदिर नै जड़ती, बार-बार पट खोलती।
जीमै कयां कोनी सांवरा, करड़ी-करड़ी बोलती।।
तूं जीमै जद मैं जीमूं, मानूं न कोई लाट की।
जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावै बेटी जाट की।।
पड़दो भूल गई रे सांवरिया, पड़दो फेर लगायो जी।
धाबळिया कै ओलै, श्याम खीचड़ो खायो जी।।
भोळा भगतां सूं सांवरा, अतरी कांई आंट जी।
जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावै बेटी जाट की।।
भक्त हो तो करमा जैसी, सांवरियो घर आयो जी।
भाई लोहाकर, हरख-हरख जस गायो जी।।
सांचो प्रेम प्रभु में हो तो, मुरती बोलै काठ की।
जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावै बेटी जाट की।।

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

NAGOUR ME LAGAYI JAYEGI SHAHID KHUMA RAM JAT KI PRATIMA

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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

किसान केसरी बलदेवराम मिर्धा की 62वीं पुण्यतिथि आज

किसान केसरी बलदेवराम मिर्धा की आज 62वीं पुण्यतिथि है। बलदेव राम मिर्धा की पुण्यतिथि पर उनके पैतृक गांव कुचेरा में उनकी समाधि पर पुष्पांजलि का कार्यक्रम आयोजित किया गया।  बलदेव राम मिर्धा की पुण्य तिथि के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में जन प्रतिनिधि, किसान वर्ग शामिल हुए। 

-किसान वर्ग में सामाजिक उत्थान हेतु किये भरसक प्रयास :-
किसान केसरी बलदेवराम मिर्धा ने किसान वर्ग में सामाजिक उत्थान हेतु भरसक प्रयास किये। बलदेवराम मिर्धा ने आजादी से पूर्व तत्कालीन मारवाड़ स्टेट के पुलिस विभाग में DIG रहते हुए ग्रामीण-किसान वर्ग में शैक्षिक-सामाजिक उत्थान हेतु  बहुत प्रयास किये । रियासत की नौकरी करते हुए भी मारवाड़ में सिलसिलेवार किसान छात्रावासों की स्थापना की और गाँवो से भुखमरी की कगार पर बैठे बच्चो को इन छात्रावासों में रखकर शिक्षा दिलाई ।


बलदेवराम मिर्धा का लक्ष्य गुलामी की ठोकरों से पीड़ित लोगो का जीवन स्तर ऊपर उठाते हुए स्वाभिमान से जीने लायक बनाना था। आजादी के बाद इन छात्रावासों से निकले हजारों लोग राजनेतिक, प्रशासनिक, सरकारी और ठेकादारी क्षेत्र में सफलता के शिखर पर पहुंचे । 1953 में मिर्धा का निधन हो गया था। 

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पे मिटने वालों का यही बांकी निशां होगा।।


वतन की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले असंख्य शहीद शूरवीर और रणबांकुरों की शौर्य गाथाएं इतिहास के पन्नों पर बड़े स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिन्हंे पढ़ने मात्र से ही देशभक्ति, स्वाभिमान और वतन के लिए मर मिटने का असीम ज़ज्बा पैदा हो जाता है। ऐसे ही एक अनूठे शूरवीर और पराक्रमी देशभक्त थे बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह। 

राजा नाहर सिंह की वीरता, रणकौशलता और वतनपरस्ती ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अपै्रल, 1821 को बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। यह रियासत दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण में पड़ती थी। सातवीं पीढ़ी पूर्व पैदा हुए उनके पड़दादा राजा बलराम उर्फ ‘बल्लू’ के नाम से ही उनके शहर का नाम ‘बल्लभगढ़’ पड़ा, जो कि हरियाणा प्रदेश के पलवल जिले में पड़ता है। राजा नाहर सिंह के खून में भी अपने पूर्वजों की भांति स्वदेश, स्वराज और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे बचपन से ही अत्यन्त वीर, साहसी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अल्पायु मंे ही घर-परिवार और रियासत की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठा लिया और उनका बखूबी निर्वहन किया। मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह कपूरथला की राजकुमारी किशन कौर के साथ हो गया। इसके दो वर्ष बाद ही 18 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान हो गया। इन विपरीत एवं विकट परिस्थितियों के बीच इस पराक्रमी युवा नाहर सिंह ने 20 जनवरी, 1839 को बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली। उस समय बल्लभगढ़ रियासत में कुल 210 गाँव शामिल थे। इतनी बड़ी रियासत की बागडोर किशोरावस्था में संभालना युवा नाहर सिंह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने बड़े दृढ़-संकल्प के साथ स्वीकार किया।


राजा नाहर सिंह ने रियासत की बागडोर संभालते ही अपनी सैन्य शक्ति को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उस समय अंग्रेजी सरकार के जुल्मों और मनमानी नीतियों से देशवासी बुरी तरह त्रस्त थे। रियासती राजाओं को अपना वजूद बनाए रखना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध बोलना अथवा बगावत करना, नरक के द्वार खोलने के समान था। क्रूर अंग्रेजों का खौफ देशवासियों पर पूरी तरह हावी था। ऐसे भंयकर हालातों के बीच युवा नाहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटाया और स्वयं को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए अपनी सेना को युरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स न देने और बल्लगढ़ रियासत में अंग्रेजों के न घूसने का फरमान सुना दिया। इससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्हें राजा नाहर सिंह अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ा खतरा दिखाई देने लगे। 

राजा नाहर सिंह की वीरता और पराक्रम की कहानियां देशभर में गूंजनें लगीं। राजा नाहर सिंह ने एक घुड़सवारों की अत्यन्त कुशल और मजबूत सेना तैयार की और पलवल से लेकर दिल्ली तक गश्त करवानी शुरू कर दी। ऐसे में उनका अंग्रेजी सरकार से सीधा टकराव एकदम सुनिश्चित था। राजा नाहर सिंह का अंग्रेजी हुकुमत के साथ कई बार टकराव हुआ और हर बार अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अंग्रेज बिग्रेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि  अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 10 मई, 1857 को मेरठ और अंबाला में सैनिक विद्रोह ने की चिंगारी ने देशभर में बगावत के शोले भड़का दिए। इसी के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया। राजा नाहर सिंह इस संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के विरूद्ध एकदम सक्रिय हो गए। इन सब घटनाक्रमों के बीच देश के दिल दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया और दिल्ली के तख्त पर बहादुरशाह जफर को सत्ता को बैठाया गया और राजा नाहर सिंह उनके अग्रणी रक्षक एवं सलाहकार बने।

दिल्ली को फिर से हासिल करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बहादुरशाह जफर पर हर प्रकार का कड़ा शिकंजा कस दिया और उस पर तख्त छोड़ने के लिए भारी दबाव बना दिया। इन विकट एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच बहादुरशाह जफर ने राजा नाहर सिंह को बुलाया और आगरा तथा मथुरा से आई अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरशाह जफर का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह तुरंत दिल्ली के लिए चल पड़े। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा करने के लिए एक अभेद चक्रव्युह रचा। दिल्ली पर हमला करने से पूर्व परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के उपरांत कर्नल लारेंस ने गवर्नर को एक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा कि, ‘‘दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में राजा नाहर सिंह की बहुत मजबूत मोर्चाबंदी है। हमारी सेनाएं इस दीवार को तब तक नहीं तोड़ सकतीं, जब तक चीन या इंग्लैण्ड से कुमक न आ जाये।’’ कर्नल लारेंस के इस पत्र की शब्दावली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय अंग्रेजी सरकार राजा नाहर सिंह की सैन्य और रणकौशलता से किस हद तक खौफ खाती थी। कर्नल लारेंस की सलाह को मानते हुए अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का साहस नहीं जुटाया और कश्मीरी गेट से 13 सितम्बर, 1857 को हमला बोल दिया।
 इसी बीच अंग्रेजों ने बड़ी कूटनीतिक चाल चली और उसने पीछे से राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर भारी हमला कर दिया। अपने राजा की अनुपस्थिति में बल्लभगढ़ रियासत के वीर सेनापति बड़ी बहादुरी के साथ लड़े और शहादत को प्राप्त हुए। रियासत पर अंग्रेजी सेना के हमले का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह वापस दौड़े। अंग्रेजों ने अपने चक्रव्युह में कामयाबी हासिल करते हुए दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया और बहुत बड़ी साजिश को अंजाम देते हुए धोखे से बहादुरशाह जफर को बन्दी बना लिया। दिल्ली पर पुनः कब्जा करने और बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाने के बाद अंग्रेजी सरकार के हौंसले बुलन्द हो गए। लेकिन, शूरवीर एवं पराक्रमी राजा नाहर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत पहुँचने के बाद नए सिरे से अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चेबन्दी की और आगरा व मथुरा से आई अंग्रेजी सेना से भीड़ गए। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ से लाशों के ढे़र लग गए और खून की धाराएं बह निकलीं। इस मुकाबले में अंग्रेजी सेना को भारी हानि उठानी पड़ी। असंख्य अंग्रेजी सिपाहियों को बन्दी बना लिया गया। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना के पाँव उखड़ने लगे। जब अंग्रेजों को साफ तौरपर अपनी हार दिखाई पड़ने लगी तो उन्होंने एक और नया चक्रव्युह राजा नाहर सिंह को फंसाने के लिए रचा। अंग्रेजी सेना ने युद्ध रोककर एकाएक सन्धि के प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया। अंग्रेजों की इस धुर्तता व चक्रव्युह को राजा नाहर सिंह बिल्कुल नहीं समझ पाये और उन्होंने भी युद्ध बन्द कर दिया।


एक सुनियोजित षड़यंत्र रचते हुए अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधियों ने राजा नाहर सिंह को जाकर बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह जफर से अंग्रेजी सरकार बातचीत कर रही है और उनके साथ सन्धि की जा रही है। चूंकि वे सम्राट के प्रमुख विश्वास पात्र और शुभचिन्तक हैं तो उन्हें सम्राट ने याद किया। इसीलिए युद्ध बन्द किया गया है और सन्धि के लिए सफेद झण्डा लहराया गया षड़यंत्र से अनजान राजा नाहर सिंह अपने पाँच सौ विश्वस्त लड़ाकों के साथ दिल्ली कूच कर गये। अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिकों को घात लगाकर राजा नाहर सिंह को बन्दी बनाने के लिए रास्ते में पहले से ही छिपा दिए थे। जब राजा नाहर सिंह उस रास्ते से गुजरने लगे तो अंग्रेजी सैनिकों ने एकाएक घात लगाकर हमला बोल दिया और वीर पराक्रमी शेर राजा नाहर सिंह को धोखे से कैद कर लिया। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों ने भारी फौजी के साथ राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला बोल दिया। एक बार फिर अपने राजा की अनुपस्थिति में रियासत के शूरवीर रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। तीन दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद रियासत के शूरवीर सैनिक बड़ी संख्या में शहादत को प्राप्त हो गये और रियासत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।


दिल्ली में बन्दी बनाए गए राजा नाहर सिंह के सामने अंग्रेजी मेजर हड़सन पहुँचे और उन्हें अंग्रेजों से मित्रता करने एवं माफी माँगने का प्रस्ताव सुनाया। उन्होंने यह प्रस्ताव रखते हुए राजा नाहर सिंह से कहा कि ‘‘नाहर सिंह ! मैं आपको फांसी से बचाने के लिए कह रहा हूँ। आप थोड़ा सा झुक जाओ।’’ स्वाभिमान और वतरपरस्ती के जज्बों से भरे राजा नाहर सिंह ने यह प्रस्ताव सुनकर हड़सन की तरफ पीठ फेर ली और दो टूक जवाब दिया, ‘‘राजा नाहर सिंह वो राजा नहीं है, जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। ब्रिटिश लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहर सिंह न रहा तो क्या? कल लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।’’ मेजर हड़सन को राजा नाहर सिंह से ऐसे करारे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी। वह एकदम बौखला उठा। अंग्रेजी सरकार ने राजा नाहर सिंह को फांसी पर लटकाने का निश्चय कर लिया और साथ ही उनके तीन अन्य वीर क्रांतिकारी साथियों खुशहाल सिंह, गुलाब सिंह और भूरे सिंह को भी फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी कर दिया गया।

अंग्रेजों ने हिन्दूस्तानियों में भय बैठाने और क्रांतिकारियों में खौफ पैदा करने के उद्देश्य से राजा नाहर सिंह और उनके तीन साथियों को 9 जनवरी, 1857 को दिल्ली के चाँदनी चौक पर सरेआम फांसी पर लटकाने का निर्णय ले लिया। हड़सन ने फांसी पर लटकाने से पहले राजा नाहर सिंह से उनकीं आखिरी इच्छा के बारे में पूछा तो भारत माता के इस शेर ने दहाड़ते हुए कहा था, ‘‘मैं तुमसे और ब्रिटानी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने खड़े हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ कि क्रांति की इस चिंगारी को बुझने न देना।’’ शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह के ये अंतिम शब्द हड़सन सहित अंग्रेजी सरकार के नुमाइन्दों के कानों में पिंघले हुए शीशे के समान उतर गए। अंततः भारत माता के इस सच्चे व अजेय लाल को उनके लोगों के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका दिया और उनके साथ ही तीन अन्य महान क्रान्तिकारियों ने भी अपनी भारत माँ की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हर किसी ने उनकीं वीरता, साहस और देशभक्ति के जज्बे को दिल से सलाम किया। आजादी के ऐसे दिवानों और बलिदानियों का यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा। उन्हें हृदय की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।

ग्वालियर दुर्ग पर मराठों को हराकर काबिज हो गए गोहद के जाट राजा

मात्र एक हजार बंदूकधारी सैनिकों की सहायता से जब गोहद के जाट राजा भीम सिंह ने अजेय कहे जाने वाले ग्वालियर दुर्ग पर हमला बोला तो उस समय किले के चारों ओर घेरा डाले मराठा सैनिक भी उनका मुकाबला नहीं कर पाए। 
इतिहास में दर्ज है मराठों की यह हार.....

-यह घटना 1754 की है, जब मराठा सेनाएं दक्षिण की ओर लौट रही थीं। मराठा सेनापति विट्ठल विंचुरकर ने अपना पड़ाव ग्वालियर में डाला और दुर्ग को घेर लिया।
-उस समय मुगल शासक की ओर से किश्वर अली खान दुर्ग का किलेदार था। किश्वर अली ने अपने थोड़े से सैनिकों के साथ मराठों का मुकाबला किया।
-जब हालात नहीं संभले तो उसने गोहद के जाट राजा भीम सिंह से मदद मांगी। भीम सिंह अपने एक हजार बंदूकधारी सैनिकों को लेकर दुर्ग पर पहुंच गए।
-राजा भीम सिंह ने और बहादुरपुर गांव के पास मराठा सरदार विंचुरकर के ऊपर हमला बोल दिया।

हमले में पराजित हो गए मराठा
-इस हमले में आसपास के राजाओं ने भी भीम सिंह की मदद की औऱ मराठों को पीछे हटना पड़ा।
-कुछ महीनों तक जाट राजा भीम सिंह का दुर्ग पर कब्जा रहा।
-मराठा इस हार को पचा नहीं पाए। एक मराठा सरदार रघुनाथ राव दिल्ली से दक्षिण की ओर वापस आ रहे थे। उसी दौरान उन्होंने ग्वालियर दुर्ग को घेर लिया।

दूसरे युद्ध में हार गए जाट राजा
-जाट राजा भीम सिंह औऱ मराठों के बीच एक महीने तक घमासान युद्ध हुआ। इस बीच सालू गांव के पास भीम सिंह को पहले से ताक में बैठे मराठा सरदार विंचुरकर ने घेर लिया।
-इस युद्ध में भीम सिंह घायल हो गए। उनके अंगरक्षक जैसे-तैसे भीम सिंह को दुर्ग पर ले गए। यहां पर उनकी मौत हो गई। आज भी उनकी छत्री दुर्ग पर बनी हुई है।



पुण्यतिथि - चौधरी बलदेवराम मिर्धा

चौधरी बलदेवराम मिर्धा 

जन्म १७ जनवरी, १८८९ को कुचेरा में हुआ और नागौर में २४ वर्ष की आयु में थानेदार बने, ३४ वर्ष की आयु में पुलिस इन्स्पेक्टर और ३७ वर्ष की उम्र में एसपी, जोधपुर और सन् १९३४ के प्रारम्भ में डिप्टी-इन्सपेक्टर -जनरल, जोधपुर में पद्दोन्नत हुए राष्ट्र भाव के कारण आपने स्वेच्छा से सेवा निवृत्ति १९४७ में ली और पूर्ण रूप से समाज सेवा में सलंग्न हो गए।

 मिर्धा  महान सेवक, किसानों के रक्षक तथा समाज-सेवी महापुरुष थे। आपने अपने काम के साथ ही अपनी समाज-सेवा, ग्राम-उत्थान ओर शिक्षा प्रसार की योजनानुसार गांव-गांव में घूम-घूम कर किसानों के बच्चों को विद्याध्ययन की प्रेरणा दी। आपने मारवाड़ में छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी। 

किसान, मजदूर, गरीब और दीन-हीन को, समाज सेवी मिर्धा जी ने सहारा दिया, किसानों को निडर, निर्भिक और अधिकारों के लिए जूझारू होना सिखाया 
समाज की सेवा करते हुए लाडनूं में २ अगस्त, १९५३ में उनका स्वर्गवास हो गया।

किसान जागृति के प्रेरणा स्त्रोत बलदेव राम मिर्धा की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजली.....