बायतु -
यह प्रसिद लोक
देवता खेमा बाबा का जन्म स्थल है।यहा पर
गुजरात और राजस्थान के दुर दुर से
यात्री आते है। भादवा सुदी नवमी माघ
सुदी नवमी और चैत्र
सुदी नवमी को मेला लगता है।
हरलाल जाट का मेला-
यह मेला भले ही शिक्षित वर्ग तक सीमित
हो लेकिन बलदेव नगर का सबसे पवित्र स्थान है
फौजीऔ का देवता भी कहा जाता है क्योकि HLH से
सबसे ज्यादा फौजी बनते है . "जाटो का शेर" इस
उपनाम से हरलाल को जाना जाता है.
JAT - PRIDE OF THE WORLD "विश्व गौरव जाटों की संस्कृति,इतिहास,परंपरा और समाचारों का साझा ब्लॉग (चिट्ठा)"
रविवार, 15 सितंबर 2013
शनिवार, 14 सितंबर 2013
मालानी री धरा में जन्मया- सिद्धपुरुष खेमा बाबा
सिद्धपुरुष खेमा बाबा - राजस्थान के लोक देवता जिन्होंने समाज को एक नयी दिशा दी
बाड़मेर जिलै रै बायतू गाम मांय जनम्या खेमा बाबा जाटा हा। अै सदीव साधु- संन्यासी रै बेस मांय रैया करता हा, जिणरी वजै सूं लोग इणां नै 'खेमा बाबा' रै नाम सूं बतलावता।
अै आपरै जीवण मांय जैरीलै जीव-जंतुवां रै काटियौड़ै लोगां रा झाड़ा-झपटा करिया करता। इण भांत अै
अणगिणत लोगां नै अभयदान दिया। आपरै जीवण रै छहलै बगत ताईं अै बायतूं मायं इज रैया। सुरगवास सूं पांच-सात घड़ी पैला अै आपरै सगै-संबंधियां, मित्रां अर गामवासियां सूं आग्रह करियौ हौ के अबै म्हारौ अंतिम
बगत आयग्यौ है, थे लोग म्हनै अमुक जगै लिजाय'र बिना बालियां गाड दीजौ अर उण जगै अेक
चबूतरौ बणवाय दीजौ। जे किणी नै कोई तकलीफ हुय जावै तौ चबूतरै माथै नालेर इत्याद चढा देवैला तौ उणनै
किणी ई तरै री तकलीफ नीं हुवैला। खास तौर सूं जैरीलै जीव-जंतुवां रै काटियां तौ तत्काल इज आराम हुय
जावैला।
सिद्धपुरुष जाट खेमाराम जाखड़ आपरौ नश्वर शरीर
त्याग दियौ। उणां रै कैयां मुजब उणां नै अमुक स्थान
माथै गाडण सारू लेयग्या, पण वा जमीन बायतू रै अेक
ठाकर री ही, जिकां अपणी जमीन मांय गाडण
नीं दिया। कीं बगत बाद अचाणक ठाकर नै निपटण
री शंका हुई। ठाकर निपटण सारू गाम रै बारै गया।
सिद्धपुरुष खेमा बाबा रै नश्वर शरीर नै आपरी जमीन
मांय नीं गाडण देवण री बजै सूं जैरीला जीवजन्तु ठाकर
नै घेर लियौ। ठाकर जद अणूंती देर तांण बावड़िया नीं तौ परिवार रा सगला ई लोग उणां रै नीं बावड़ियां चिंतातुर हुवण लागग्या। उठीनै
खेमा बाबा रै नश्वर शरीर नै उणी जगै गाडण री मंजूरी सारू हजारूं लोग उडीक रैया हा। जद ठाकर नै सोधण सारू नौकर भेजीजियौ तौ पतौ लागियौ के वै तौ जैरीलै जीव-जंतुवां रै जाल सूं मुगत हुया। ठाकर
खेमा बाबा रै चमत्कार सूं प्रभावित हुय'र आपरी जमीन
मांय उणां रै शरीरर नै गाडण री मंजूरी देय दी अर खुद आपरै खरजै सूं उण माथै चबूतरौ बणवाय'र पैलौ नालेर
चढायौ।
आज वौ इज चबूतरौ अेक सुंदर मिंदर रै रूप मांय नागदेवता री बणियोड़ी प्रतिमावां अेक नीं, अनेकूं
विराजमान है। मिंदर रै च्यारूंमेर पक्की दीवारां रौ परकोटौ अर उणरै बीच मांय
जातरूवां रै ठैरण अर मिंदर रै कर्मचारियां अर पुजारियां रै रैवास सारू पक्का मकान बणियोड़ा है।
मिंदर रे लारली कानी 150 फुट सूं ई ऊंचौ रेतीलौ धोरौ आयौ थकौ है।
मेलै मांय हिस्सौ लेवण सारू दूर-दूर सूं हजारूं जातरूं अेकठ हुवै। जैरीलै जीव-जंतुवां सांप-बिच्छु इत्यार रै
काटियां उणी बगत इणां रै स्थल री जातरा करण, पूजा चढावण री जाचना करण अर मोरपांख नै
काडियौडै़ स्थल माथै बांधियां सूं तत्काल आराम मिल जावै। अैड़ौ करियां अेक नीं, अनेकूं श्रद्धालू भगतां नै
आराम अर राहत मिली है। नतीजन मैलै रै मौकै माथै हजारूं री तादाद में स्त्री, पुरुष, बच्चा, बूढ़ा सगला आवै, जिका आपरै साथै छोटौ-सोक सफेद कपड़ौ त्रिकोण आकार रौ लावै अर आपरी जाचना, चढावै .चढायां रे बाद उणनै नजीक खड़ै पेड़ रै बांध देवै।
मेलै रै अेक दिन विसाल पैमानै माथै भजन-कीरतन रौ आयोजन हुवै। उण मांय हर जाति रा लोग हिस्सौ लेवै। औ कार्यक्रम रात भर चालू रैवै। सूबै-सवाणी हजारूं लोग खेमा बाबा रै मिंदर दरसणां सारू जावै अर प्रसाद चढावै। प्रसाद सूं नीं जाणै कित्ती ई बोरियंा भर जावै। औ प्रसाद बाद में भजन करण वालां अर पिछड़ी जातियां रै लोगां मांय बांट दियौ जावै।
बाड़मेर जिलै रै बायतू गाम मांय जनम्या खेमा बाबा जाटा हा। अै सदीव साधु- संन्यासी रै बेस मांय रैया करता हा, जिणरी वजै सूं लोग इणां नै 'खेमा बाबा' रै नाम सूं बतलावता।
अै आपरै जीवण मांय जैरीलै जीव-जंतुवां रै काटियौड़ै लोगां रा झाड़ा-झपटा करिया करता। इण भांत अै
अणगिणत लोगां नै अभयदान दिया। आपरै जीवण रै छहलै बगत ताईं अै बायतूं मायं इज रैया। सुरगवास सूं पांच-सात घड़ी पैला अै आपरै सगै-संबंधियां, मित्रां अर गामवासियां सूं आग्रह करियौ हौ के अबै म्हारौ अंतिम
बगत आयग्यौ है, थे लोग म्हनै अमुक जगै लिजाय'र बिना बालियां गाड दीजौ अर उण जगै अेक
चबूतरौ बणवाय दीजौ। जे किणी नै कोई तकलीफ हुय जावै तौ चबूतरै माथै नालेर इत्याद चढा देवैला तौ उणनै
किणी ई तरै री तकलीफ नीं हुवैला। खास तौर सूं जैरीलै जीव-जंतुवां रै काटियां तौ तत्काल इज आराम हुय
जावैला।
सिद्धपुरुष जाट खेमाराम जाखड़ आपरौ नश्वर शरीर
त्याग दियौ। उणां रै कैयां मुजब उणां नै अमुक स्थान
माथै गाडण सारू लेयग्या, पण वा जमीन बायतू रै अेक
ठाकर री ही, जिकां अपणी जमीन मांय गाडण
नीं दिया। कीं बगत बाद अचाणक ठाकर नै निपटण
री शंका हुई। ठाकर निपटण सारू गाम रै बारै गया।
सिद्धपुरुष खेमा बाबा रै नश्वर शरीर नै आपरी जमीन
मांय नीं गाडण देवण री बजै सूं जैरीला जीवजन्तु ठाकर
नै घेर लियौ। ठाकर जद अणूंती देर तांण बावड़िया नीं तौ परिवार रा सगला ई लोग उणां रै नीं बावड़ियां चिंतातुर हुवण लागग्या। उठीनै
खेमा बाबा रै नश्वर शरीर नै उणी जगै गाडण री मंजूरी सारू हजारूं लोग उडीक रैया हा। जद ठाकर नै सोधण सारू नौकर भेजीजियौ तौ पतौ लागियौ के वै तौ जैरीलै जीव-जंतुवां रै जाल सूं मुगत हुया। ठाकर
खेमा बाबा रै चमत्कार सूं प्रभावित हुय'र आपरी जमीन
मांय उणां रै शरीरर नै गाडण री मंजूरी देय दी अर खुद आपरै खरजै सूं उण माथै चबूतरौ बणवाय'र पैलौ नालेर
चढायौ।
आज वौ इज चबूतरौ अेक सुंदर मिंदर रै रूप मांय नागदेवता री बणियोड़ी प्रतिमावां अेक नीं, अनेकूं
विराजमान है। मिंदर रै च्यारूंमेर पक्की दीवारां रौ परकोटौ अर उणरै बीच मांय
जातरूवां रै ठैरण अर मिंदर रै कर्मचारियां अर पुजारियां रै रैवास सारू पक्का मकान बणियोड़ा है।
मिंदर रे लारली कानी 150 फुट सूं ई ऊंचौ रेतीलौ धोरौ आयौ थकौ है।
मेलै मांय हिस्सौ लेवण सारू दूर-दूर सूं हजारूं जातरूं अेकठ हुवै। जैरीलै जीव-जंतुवां सांप-बिच्छु इत्यार रै
काटियां उणी बगत इणां रै स्थल री जातरा करण, पूजा चढावण री जाचना करण अर मोरपांख नै
काडियौडै़ स्थल माथै बांधियां सूं तत्काल आराम मिल जावै। अैड़ौ करियां अेक नीं, अनेकूं श्रद्धालू भगतां नै
आराम अर राहत मिली है। नतीजन मैलै रै मौकै माथै हजारूं री तादाद में स्त्री, पुरुष, बच्चा, बूढ़ा सगला आवै, जिका आपरै साथै छोटौ-सोक सफेद कपड़ौ त्रिकोण आकार रौ लावै अर आपरी जाचना, चढावै .चढायां रे बाद उणनै नजीक खड़ै पेड़ रै बांध देवै।
मेलै रै अेक दिन विसाल पैमानै माथै भजन-कीरतन रौ आयोजन हुवै। उण मांय हर जाति रा लोग हिस्सौ लेवै। औ कार्यक्रम रात भर चालू रैवै। सूबै-सवाणी हजारूं लोग खेमा बाबा रै मिंदर दरसणां सारू जावै अर प्रसाद चढावै। प्रसाद सूं नीं जाणै कित्ती ई बोरियंा भर जावै। औ प्रसाद बाद में भजन करण वालां अर पिछड़ी जातियां रै लोगां मांय बांट दियौ जावै।
शुक्रवार, 13 सितंबर 2013
जसनाथ धाम में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
बाड़मेर- जसनाथ धाम
लीलसर में गुरुवार को भाद्रपद
की सप्तमी पर आयोजित मेले में श्रद्धालुओं
की भीड़ उमड़ी। आसपास के गांवों सहित
जिलेभर से भारी संख्या में भक्तों ने शिरकत
की और भगवान जसनाथ के दर्शन कर मन्नतें
मांगी। महंत मोटनाथ महाराज ने
बताया कि गुरुवार को सुबह सात बजे से
ही मेला शुरू हो गया, आसपास के गांवों से
काफी संख्या में भक्त पैदल ही मेला स्थल पहुंचे
और भगवान जसनाथ के दर्शन कर मन्नतें
मांगी। दोपहर होने तक तो मेला स्थल पर
भक्तों की भारी भीड़ के कारण पैर रखने
को जगह नहीं मिल रही थी। भक्तों ने कतार
में खड़े होकर जसनाथ भगवान के दर्शन किए
और मन्नतें मांगी। महंत से लिया आशीर्वाद :
मेले के दौरान जसनाथ मंदिर के महंत
मोटनाथ से आशीर्वाद लेने को लेकर
भक्तों का तांता लगा रहा। महंत से
आशीर्वाद के साथ ही मंदिर की फेरी लगाई
और दर्शन किए। मेले में सोडियार, बाछड़ाऊ,
सनावड़ा, बूठ जेतमाल, मेहलू, नोखड़ा, कगाऊ,
उड़ासर, धोरीमन्ना, चौहटन, इसरोल,
रामदेरिया, शोभाला जैतमाल,
मांगता सहित आसपास के गांवों व जिलेभर से
भारी संख्या में भक्त विभिन्न वाहनों से
मेला स्थल पहुंचे और दर्शन कर मन्नतें मांगी।
मेले को लेकर मंदिर को आकर्षक रोशनी से
सजाया गया। विवाहित जोड़ों ने लगाई
जात: मान्यता है कि विवाहित जोड़े
शादी के बाद मंदिर में जात लगाने के लिए
आते है। जहां मंदिर में दपंति सुखद जीवन के
लिए भगवान के दर्शन कर मंदिर के चारों ओर
जात लगाते है। नव विवाहित जोड़े शादी के
बाद मंदिर में अवश्य रूप से फेरी लगाने के
लिए आते है। विवाहित जोड़ों ने मंदिर
की प्रक्रिमा कर सुखद जीवन
की कामना की।
लीलसर में गुरुवार को भाद्रपद
की सप्तमी पर आयोजित मेले में श्रद्धालुओं
की भीड़ उमड़ी। आसपास के गांवों सहित
जिलेभर से भारी संख्या में भक्तों ने शिरकत
की और भगवान जसनाथ के दर्शन कर मन्नतें
मांगी। महंत मोटनाथ महाराज ने
बताया कि गुरुवार को सुबह सात बजे से
ही मेला शुरू हो गया, आसपास के गांवों से
काफी संख्या में भक्त पैदल ही मेला स्थल पहुंचे
और भगवान जसनाथ के दर्शन कर मन्नतें
मांगी। दोपहर होने तक तो मेला स्थल पर
भक्तों की भारी भीड़ के कारण पैर रखने
को जगह नहीं मिल रही थी। भक्तों ने कतार
में खड़े होकर जसनाथ भगवान के दर्शन किए
और मन्नतें मांगी। महंत से लिया आशीर्वाद :
मेले के दौरान जसनाथ मंदिर के महंत
मोटनाथ से आशीर्वाद लेने को लेकर
भक्तों का तांता लगा रहा। महंत से
आशीर्वाद के साथ ही मंदिर की फेरी लगाई
और दर्शन किए। मेले में सोडियार, बाछड़ाऊ,
सनावड़ा, बूठ जेतमाल, मेहलू, नोखड़ा, कगाऊ,
उड़ासर, धोरीमन्ना, चौहटन, इसरोल,
रामदेरिया, शोभाला जैतमाल,
मांगता सहित आसपास के गांवों व जिलेभर से
भारी संख्या में भक्त विभिन्न वाहनों से
मेला स्थल पहुंचे और दर्शन कर मन्नतें मांगी।
मेले को लेकर मंदिर को आकर्षक रोशनी से
सजाया गया। विवाहित जोड़ों ने लगाई
जात: मान्यता है कि विवाहित जोड़े
शादी के बाद मंदिर में जात लगाने के लिए
आते है। जहां मंदिर में दपंति सुखद जीवन के
लिए भगवान के दर्शन कर मंदिर के चारों ओर
जात लगाते है। नव विवाहित जोड़े शादी के
बाद मंदिर में अवश्य रूप से फेरी लगाने के
लिए आते है। विवाहित जोड़ों ने मंदिर
की प्रक्रिमा कर सुखद जीवन
की कामना की।
गुरुवार, 12 सितंबर 2013
अंजन की सीटी में
अंजन की सीटी में म्हारो मन
डोले
चला चला रे डिलैवर गाड़ी हौले
हौले ।।
बीजळी को पंखो चाले, गूंज
रयो जण भोरो
बैठी रेल में
गाबा लाग्यो वो जाटां को छोरो ।।
चला चला रे ।।
डूंगर भागे, नंदी भागे और भागे
खेत
ढांडा की तो टोली भागे, उड़े
रेत ही रेत ।।
चला चला रे ।।
बड़ी जोर को चाले अंजन, देवे
ज़ोर की सीटी
डब्बा डब्बा घूम रयो टोप
वारो टी टी ।।
चला चला रे ।।
जयपुर से जद
गाड़ी चाली गाड़ी चाली मैं
बैठी थी सूधी
असी जोर को धक्का लाग्यो जद मैं
पड़ गयी उँधी ।।
चला चला रे ।।
शब्दार्थ: डलेवर= ड्राईवर,
गाबा= गाने लगना, डूंगर= पहाड़,
नंदी= नदी , ढांडा= जानवर , जद=
जब (जदी, जर और जण
भी कहा जाता है), असी= ऐसा, इतना
डोले
चला चला रे डिलैवर गाड़ी हौले
हौले ।।
बीजळी को पंखो चाले, गूंज
रयो जण भोरो
बैठी रेल में
गाबा लाग्यो वो जाटां को छोरो ।।
चला चला रे ।।
डूंगर भागे, नंदी भागे और भागे
खेत
ढांडा की तो टोली भागे, उड़े
रेत ही रेत ।।
चला चला रे ।।
बड़ी जोर को चाले अंजन, देवे
ज़ोर की सीटी
डब्बा डब्बा घूम रयो टोप
वारो टी टी ।।
चला चला रे ।।
जयपुर से जद
गाड़ी चाली गाड़ी चाली मैं
बैठी थी सूधी
असी जोर को धक्का लाग्यो जद मैं
पड़ गयी उँधी ।।
चला चला रे ।।
शब्दार्थ: डलेवर= ड्राईवर,
गाबा= गाने लगना, डूंगर= पहाड़,
नंदी= नदी , ढांडा= जानवर , जद=
जब (जदी, जर और जण
भी कहा जाता है), असी= ऐसा, इतना
जाट की पहचान लेखक - सव0 स्वामी शिवराम, जावरौ ग्राम
जाट की नसल की असल
पहिचान यही,
सुंदर शरीर,
ह्रष्ट-पुष्ट डील
जाकौ है।
दाता और सूर होय, बल
भरपूर होय,
जाति पर गरुर होय,
धीर वीर बांकौ है ।।
सायर सपूत होय, दिल
मजबूत होय,
ताकत अकूत होय,
युद्ध में
अदाकौ है ।
वीर वर बांका होय,
काल की न शंका होय,
जवान ऐसे ढंग
का होय, जाट नाम
जाकौ है ।।
लोक वेद रीति जाने,
धर्म, कर्म
नीति जाने,
प्रेम भाव
प्रीति जाने,
कीरति बखानिये ।
पर उपकारी होय, धीर
व्रतधारी होय,
वीर कर्मचारी होय,
दया हिय आनिये ।।
धर्म ते टरे न कभी,
युद्ध ते डरे न
कभी ।
कहिके फिरे न कभी,
लाभ चाहे हानिये,
देश को हितेशी होय,
भावना स्वदेशी होय,
जाकी रूचि ऐसी होय,
जाट ताहि जानिये ।।
पहिचान यही,
सुंदर शरीर,
ह्रष्ट-पुष्ट डील
जाकौ है।
दाता और सूर होय, बल
भरपूर होय,
जाति पर गरुर होय,
धीर वीर बांकौ है ।।
सायर सपूत होय, दिल
मजबूत होय,
ताकत अकूत होय,
युद्ध में
अदाकौ है ।
वीर वर बांका होय,
काल की न शंका होय,
जवान ऐसे ढंग
का होय, जाट नाम
जाकौ है ।।
लोक वेद रीति जाने,
धर्म, कर्म
नीति जाने,
प्रेम भाव
प्रीति जाने,
कीरति बखानिये ।
पर उपकारी होय, धीर
व्रतधारी होय,
वीर कर्मचारी होय,
दया हिय आनिये ।।
धर्म ते टरे न कभी,
युद्ध ते डरे न
कभी ।
कहिके फिरे न कभी,
लाभ चाहे हानिये,
देश को हितेशी होय,
भावना स्वदेशी होय,
जाकी रूचि ऐसी होय,
जाट ताहि जानिये ।।
चेतो करल्यो रै - धमाळ
चेतो करल्यो रै,
साथीड़ा सगळा एको करल्यो रै,
चेतो करल्यो रै ।
जाट कमायो खावै आपको,
दूजां नै नहीं भावै रै,
मूंडा मीठी बात, पीठ पर
छुरी चलावै रै ।
चेतो करल्यो रै ..... ।।1।।
एका बिना अब पार पड़ै ना, आज
टेम आ आई रै, ओरां कानी देखो,
कैंयां शोर मचाई रै ।
चेतो करल्यो रै ..... ।।2।।
धरती मां को लाल जाट,
बो अन्नदाता कहलावै रै, जय
जवान जय किसान को परचम
पहरावै रै ।
चेतो करल्यो रै ..... ।।3।।
जाळ रच रह्या जकानैं, मिलके
सबक सिखायो रै, सांचै-मांचै
राम राचै, "पदम" रो कह्यो रै
। चेतो करल्यो रै ..... ।।4।।
साथीड़ा सगळा एको करल्यो रै,
चेतो करल्यो रै ।
जाट कमायो खावै आपको,
दूजां नै नहीं भावै रै,
मूंडा मीठी बात, पीठ पर
छुरी चलावै रै ।
चेतो करल्यो रै ..... ।।1।।
एका बिना अब पार पड़ै ना, आज
टेम आ आई रै, ओरां कानी देखो,
कैंयां शोर मचाई रै ।
चेतो करल्यो रै ..... ।।2।।
धरती मां को लाल जाट,
बो अन्नदाता कहलावै रै, जय
जवान जय किसान को परचम
पहरावै रै ।
चेतो करल्यो रै ..... ।।3।।
जाळ रच रह्या जकानैं, मिलके
सबक सिखायो रै, सांचै-मांचै
राम राचै, "पदम" रो कह्यो रै
। चेतो करल्यो रै ..... ।।4।।
लोकदेवता तेजाजी
लोकदेवता तेजाजी का जन्मनागौर जिले में खड़नाल गाँव में ताहरजी (थिरराज) औररामकुंवरी के घर माघशुक्ला, चौदस संवत 1130यथा 29 जनवरी 1074 को जाट परिवार में हुआ था।उनके पिता गाँव केमुखिया थे।
यह कथा है कि तेजाजी का विवाह बचपन में ही पनेर गाँव में रायमल्जी की पुत्री पेमलके साथ हो गया था किन्तु शादी के कुछ ही समय बाद उनके पिता और पेमल के मामा में कहासुनी हो गयी और तलवार चल गई जिसमें पेमल के मामा की मौत हो गई। इस कारण उनके विवाह की बात को उन्हें बताया नहीं गया था।
एक बार तेजाजी को उनकी भाभी ने तानों के रूप में यह बात उनसे कह दी तब तानो से त्रस्त होकरअपनी पत्नी पेमल को लेने के लिए घोड़ी 'लीलण' पर सवार होकर अपनी ससुराल पनेर गए।रास्ते में तेजाजी को एक साँप आग में जलता हुआ मिला तो उन्होंने उस साँप को बचा लिया किन्तु वह साँप जोड़े के बिछुड़ जाने के कारण अत्यधिक क्रोधित हुआ और उन्हें डसने लगा तब उन्होंने साँप को लौटते समय डस लेने का वचन दिया और ससुराल की ओरआगे बढ़े।
वहाँ किसी अज्ञानता के कारण ससुराल पक्ष से उनकी अवज्ञा हो गई।नाराज तेजाजी वहाँ से वापस लौटने लगे तब पेमल से उनकी प्रथम भेंट उसकी सहेली लाछा गूजरी के यहाँ हुई। उसी रात लाछा गूजरी की गाएं मेर के मीणा चुरा ले गए।
लाछा की प्रार्थना परवचनबद्ध हो कर तेजाजी ने मीणा लुटेरों से संघर्ष कर गाएं छुड़ाई। इस गौरक्षा युद्ध
में तेजाजी अत्यधिक घायल हो गए। वापस आने पर वचन की पालना में साँप के बिल पर आए तथा पूरे शरीर पर घाव होने के कारण जीभ पर साँप से कटवाया। किशनगढ़ के पास सुरसरा में सर्पदंश से उनकी मृत्यु भाद्रपद शुक्ल10 संवत 1160, तदनुसार28 अगस्त 1103 हो गई तथा पेमल ने भी उनके साथ जान दे दी। उस साँप
ने उनकी वचनबद्धता से प्रसन्न हो कर उन्हें वरदान दिया। इसी वरदान के कारण तेजाजी साँपों के देवता के रूप में पूज्य हुए।गाँव गाँव में तेजाजी के देवरे या थान में उनकी तलवारधारीअश्वारोही मूर्ति के साथ नाग देवता की मूर्ति भी होतीहै। इन देवरो में साँप के काटने पर जहर चूस कर निकाला जाता है तथा तेजाजी की तांतबाँधी जाती है।
तेजाजी केनिर्वाण दिवस भाद्रपद शुक्ल दशमी को प्रतिवर्ष तेजादशमी के रूप में मनाया जाता है।
यह कथा है कि तेजाजी का विवाह बचपन में ही पनेर गाँव में रायमल्जी की पुत्री पेमलके साथ हो गया था किन्तु शादी के कुछ ही समय बाद उनके पिता और पेमल के मामा में कहासुनी हो गयी और तलवार चल गई जिसमें पेमल के मामा की मौत हो गई। इस कारण उनके विवाह की बात को उन्हें बताया नहीं गया था।
एक बार तेजाजी को उनकी भाभी ने तानों के रूप में यह बात उनसे कह दी तब तानो से त्रस्त होकरअपनी पत्नी पेमल को लेने के लिए घोड़ी 'लीलण' पर सवार होकर अपनी ससुराल पनेर गए।रास्ते में तेजाजी को एक साँप आग में जलता हुआ मिला तो उन्होंने उस साँप को बचा लिया किन्तु वह साँप जोड़े के बिछुड़ जाने के कारण अत्यधिक क्रोधित हुआ और उन्हें डसने लगा तब उन्होंने साँप को लौटते समय डस लेने का वचन दिया और ससुराल की ओरआगे बढ़े।
वहाँ किसी अज्ञानता के कारण ससुराल पक्ष से उनकी अवज्ञा हो गई।नाराज तेजाजी वहाँ से वापस लौटने लगे तब पेमल से उनकी प्रथम भेंट उसकी सहेली लाछा गूजरी के यहाँ हुई। उसी रात लाछा गूजरी की गाएं मेर के मीणा चुरा ले गए।
लाछा की प्रार्थना परवचनबद्ध हो कर तेजाजी ने मीणा लुटेरों से संघर्ष कर गाएं छुड़ाई। इस गौरक्षा युद्ध
में तेजाजी अत्यधिक घायल हो गए। वापस आने पर वचन की पालना में साँप के बिल पर आए तथा पूरे शरीर पर घाव होने के कारण जीभ पर साँप से कटवाया। किशनगढ़ के पास सुरसरा में सर्पदंश से उनकी मृत्यु भाद्रपद शुक्ल10 संवत 1160, तदनुसार28 अगस्त 1103 हो गई तथा पेमल ने भी उनके साथ जान दे दी। उस साँप
ने उनकी वचनबद्धता से प्रसन्न हो कर उन्हें वरदान दिया। इसी वरदान के कारण तेजाजी साँपों के देवता के रूप में पूज्य हुए।गाँव गाँव में तेजाजी के देवरे या थान में उनकी तलवारधारीअश्वारोही मूर्ति के साथ नाग देवता की मूर्ति भी होतीहै। इन देवरो में साँप के काटने पर जहर चूस कर निकाला जाता है तथा तेजाजी की तांतबाँधी जाती है।
तेजाजी केनिर्वाण दिवस भाद्रपद शुक्ल दशमी को प्रतिवर्ष तेजादशमी के रूप में मनाया जाता है।
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