मंगलवार, 27 मार्च 2018

जन जन के आराध्य गोरक्षक लोक देवता वीर बिग्गा जी का मेला कल से

 "आप सभी सपरिवार मेले में सादर आमंत्रित है"

रूघपत कुळ में ऊपन्यौ, भागीरथ वंस मांय।
मामा गोदारा भीम-सा नानौज चूहड़ नांव।।
माता देवी सुलतानवी, मेंहद पिता कौ नांव।
रिड़ीज गढ रौ पाटवी, परण्यौ मालां रै गांव।।
जरणी जायो अेकलौ, चढ्यौ गउवां घेरण लार।
कांकड़ कोस पैंतीस पर, जा पूग्यौ भड़ वार।।
मगर पचीसां हुवौ मोटियार।
सासरै जाय, चढ़या गउवां कै लार।।
छोटकी दाईं बजाई थैं वार।
हुवौ कुळ देव बडौ जूंझार।।
हुवौ न को होसी इसौ कोई जाट।
बुवौ न को बैसी लखावट वाट।।
कंचन सेती देवळी, सब जुग लेसी नांव।
रिड़वी गढ रौ पाटवी, कियौ बिगै नै धांम।।
                                                                             

-अत्यन्त हर्ष और उल्लास के साथ सूचित किया जाता है कि जन जन के आराध्य लोक देवता वीर बिग्गाजी का दो दिवसिय मेला 28 मार्च  से जन्म स्थान व शीश देवली धाम रीड़ी एवं धड़ देवली धाम श्री बिग्गा में आयोजित होगा । इस दौरान विशाल रात्री जागरण कल शाम को तथा भव्य मेला 29 मार्च को आयोजित होगा , जिसमें आप सभी सादर आमन्त्रित है I
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निवेदक :- श्री वीर बिग्गाजी मानव सेवा संस्थान (रजि.)
वीर बिग्गाजी का मन्दिर ग्राम-श्री बिग्गा ,तह.-श्री डूँगरगढ (बीकानेर)

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

खजवाना जिला नागौर के संत श्री 1008 लिखमा बाबा महाराज

                                                                                           जाखड़ शिरोमणि दर्शन :-ओमप्रकाश बागड़वा 
                                               "संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय
                                                सुत दारा घर लक्ष्मी पापी के भी होए"
मानव का सांसारिक जीवन में अवतरण आत्म कल्याणार्थ होता है परंतु माया के वशीभूत होकर आत्म कल्याण को मार्ग से मानव विचलित हो जाता है l पूर्व जन्म के संचित कर्मों के कारण मानव को मायाजाल के बंधनों से मुक्त रखकर जीवन कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ने को प्रेरित करते हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि प्राणी एक योनि से दूसरी योनि में जन्म लेता है तब पूर्व जन्म के यात्रा वृत्तांत को विस्मृत कर देता है अर्थात भुला देता है उसे केवल वर्तमान जीवन के क्रियाकलापों की पृष्ठभूमि बनाने को प्रेरित रहते जीवन सफर पूरा करना होता है l इस जगत में कुछ ऐसे विरले संत महापुरुष, इतिहास पुरुष हुए हैं जिन्होंने अध्यात्मिक साधना, आर्थिक जगत, सामाजिक क्षेत्र, सैन्य जीवन में अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते हुए इतिहास के पन्नों पर अपनी कर्म गाथा को सिर्फ इस रुप में रच देते हैं कि वह अमिट हो जाता है। गांव बिग्गा जिला बीकानेर से एक जाखड़ परिवार खजवाना आकर बस गया, बिग्गा से खजवाना जाकर बसा श्री मगा राम जाखड़ का परिवार। इनके घर में तीन पुत्र रत्न-नन्दाराम, तुलछा राम व लिखमा राम और एक पुत्री केसर का जन्म हुआ l यह देव योग कहें या पूर्व जन्म के संचित कर्म कि श्री मगा राम जाखड़ के घर तीनों पुत्रों में से एक पुत्र लिखमा राम जाखड़ बचपन से ही संत महापुरुषों का सानिध्य पाने को लालायित रहने लगे । स्थानीय क्षेत्र में उन्हें ऐसा कोई संत पुरुष नहीं मिला जो उनकी जिज्ञासा को सही दिशा दे सके तब उन्हें 12 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर देवभूमि उत्तराखंड की ओर पलायन करना पड़ा। समर्थ सदगुरु से ज्ञान ग्रहण किया, संसारिक मोह माया से विमुक्त होने का ज्ञान पाया, अलौकिक शक्ति से ग्रहण ज्ञान को समझ लेने के बाद करीब 25 वर्ष की अवस्था में पुनः अपनी जन्मस्थली खजवाना जिला नागौर लौट आए। गांव की सरहद में एक पीपल के पेड़ के नीचे तपश्चर्या में बैठ गए। यह घटना खजवाना वासियों के लिए एक अबूझ पहेली बन गई। वार्ता चर्चा से पता लगा कि यह संत लगभग १२-१३ वर्ष पूर्व यहां से पलायन कर गया बालक लिखमाराम है, घर परिवार के सदस्यों को तो खुशी हुई। पूरे गांव में दिवाली सा वातावरण बन गया l उनके स्वागत सत्कार में परिवार जनों ने,ग्राम वासियों ने 56 भोग बनाए। बालक लिखमाराम से सन्यासी बने संत श्री लिखमाराम ने इन भोज्य पदार्थों को अस्वीकार करते हुए परिवारजनों, ग्राम वासियों से कहा कि फकीरी जीवन में 56 भोज का कोई महत्व नहीं है। जीवन चलाने के लिए रुखा सूखा जो मिल जाये प्रयाप्त है, जिस पीपल के पेड़ के नीचे संत श्री लिखमाराम विराजे। कालांतर में वहां भव्य मंदिर बन गया l पास में ही कोलायत नाडी के नाम से छोटा जलाशय था, बस वही नाडी संत श्री लिखमाराम के लिए गंगोत्री और यमुनोत्री थी। संत तपस्या में प्रवृत रहते कभी-कभार ग्राम वासियों से परिचर्चा करते हुए लौकिक -पारलौकिक ज्ञान का उपदेश देते और जीव मात्र के उद्धार में अपने आप को समर्पित किए समय की गति के साथ तालमेल बिठाएं चलते रहे। जब वे भोजन करते थे तो उनके साथ आश्रम की बिल्लियां, आश्रम के कुत्ते अन्य पंछी एक साथ आ बैठते थे और संत प्रवर को इन जीवों से कोई परहेज नहीं था। उनका मानना था, जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है। जीव योनी से अलग होने से आत्म रूप ,परमात्म तत्व से भेद कैसा ?


ग्राम वासियों और परिवार जनों के लिए यह कौतूहल का विषय था ,इनके आश्रम में जब तक कोई जीव भूखा रहता था ,तब तक आप स्वयं प्रसादी नहीं पाते थे।
यह कहा जाता है कि एक देवासी की ऊँटनी को चर्म रोग हो गया, लाखों प्रयासों के बावजूद ठीक नहीं हो रही थी तब उसे वह देवासी कोलायत नाडी आश्रम में संत शरण में छोड़ गया, कुछ दिनों बाद ऊँटनी ठीक हो गई और बिन ब्याही ऊंटनी दूध भी देने लगी। यह देख देवासी का मन ललचाया, वह चोरी से ऊँटनी को वापस अपने घर ले जाने का मन बना कर आया, पर ऊँटनी को घर नहीं ले जा पाया। ऊँटनी अप्रत्यक्षत उसकी नजरों के सामने दिखाई दे रही थी पर वास्तव में वह ऊँटनी की प्रतिछाया मात्र थी। अतः हताश निराश होकर देवासी घर लौट गया। तब से गांव में संत प्रवर के प्रति लोगों में श्रद्धा भाव बढ़ने लगा और रोग ग्रस्त पशुओं को लोग वहां लाने लगे जो भभूत मात्र से अथवा परिक्रमा देने से ठीक हो जाते थे। अधिक दूरी से जो पशुपालक अपने पालतू पशुओं को वहां लाने में समर्थ नहीं होते थे वे पशुओं को बांधने की सांकळ अर्थात रस्सी को वहां लाकर पूजा स्थल की भभूत लगाने, रस्सी को परिक्रमा दिलाने से पशु ठीक हो जाते रहे। मूक पशुओं के प्रति कितना गजब का उपकार भाव संत प्रवर में देखने को मिलता है इन चमत्कारों की जानकारी गांव के वृद्धजनों के मौखिक वार्तालाप से मिलती है।
लगभग विक्रम संवत 1980 में 70-80 वर्ष की अवस्था में आप श्री वैकुण्ठ धाम के लिए समाधिस्थ हो गए.
इतना ही नहीं चैत्र शुक्ला त्रयोदशी अर्थात चैत्र सुदी तेरस को डूंगरगढ़ स्थित बिग्गा गढ़ धाम की तर्ज पर यहां भी भव्य जन मेला आयोजित होता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालुजन अपनी मनौती मनाने यहां उपस्थित होते हैं, यहां लोगों का यह भी मानना है कि कोई पीलिया रोगी यहां आकर कोलायत नाडी का जल मंदिर स्थित संत चरण पर प्रवाहित कर पुनः अपने बर्तन में लेकर आचमन करते हैं अर्थात पीते हैं तो पीलिया रोग जड़ से मिट जाता है और उस व्यक्ति को जीवन में फिर कभी पीलिया रोग होता ही नहीं है, ऐसे पूजा स्थल जनमानस की निगाहों में चारधाम, सातों पुरियों से कम नहीं है।
इसे विडंबना ही कहें कि उस काल में जाट समाज में शिक्षा का इतना प्रचार-प्रसार नहीं था इसलिए ऐसे महापुरुषों की चमत्कारिक जीवन लीला का जीवन वृतांत लेखनी बद्ध नहीं किया जा सका। वर्ग विशेष के जो लोग साक्षर थे। जीवन इतिहास लिखने में सक्षम थे, उन्होंने इस ओर कलम चलाना अपनी नीति के अनुकूल नहीं माना, क्योंकि उनमें एक छिपा भय था कि यदि जाट संतों को महिमामंडित किया तो हमारे आका रुष्ट हो जाएंगे। जाट अनपढ़ थे तो हम बेचारे ढाढियों की बिसात ही क्या ?
पर आज जो दंतकथाओं, लोक धारणाओं में जो चर्चाएं वार्ताएं सुनने को मिलती है उन्हें लेखनी बद्ध कर पाठक वर्ग के सम्मुख प्रस्तुत करने का काम आपका सेवक मैं ओमप्रकाश बागड़वा कर रहा हूं , मुझे संत प्रवर के अवतरण से लेकर चमत्कारिक जीवनशैली और जीवन इतिहास का वृतांत विवरण जो वार्ताओं चर्चाओं से मिला उनमें श्री जगाराम पुत्र श्री रामदेव , श्री भंवरू राम पुत्र श्री सांवता राम, श्री राम निवास पुत्र श्री जाला राम की महती भूमिका रही। इन्होंने जो ज्ञान अपने पूर्वजों से संत श्री लिखमाराम जी के बारे में प्राप्त किया, वही ज्ञान अपने श्री मुख से दंतकथा के रूप में मुझे कहा, सुनाया। विगत वार हुए चमत्कारों और संतप्रवर के जीवन दर्शन का जो चित्रण इन सज्जनों के श्री मुख से सुनने को मिला, वह ओमप्रकाश बागड़वा की कलम से जाखड़ शिरोमणि दर्शन में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है।

खुद की नहीं थी राइफल, 20 हजार में किराए पर ली, अब नेशनल चैंपियनशिप में चयन


पाली पुलिस में कांस्टेबल राकेश जाखड़ ने राष्ट्रीय शूटिंग एसोसिएशन की ओर से गुडगांव में आयोजित प्री नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में भाग लेकर राष्ट्रीय नेशनल चैंपियनशिप के लिए किया क्वालीफाई
भाई राकेश जाखड़( राजस्थान पुलिस- पाली) का नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में चयन होने पर उनको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ...
खुद के पास अपनी राइफल नहीं होने के बावजूद पाली पुलिस में कांस्टेबल राकेश जाखड़ ने 20 हजार रुपए में किराए पर राइफल लेकर ऐसा अचूक निशाना साधा कि उनका चयन नेशनल चैंपियनशिप के लिए हो गया। यही नहीं, पति का सपना पूरा करने के लिए एसबीआई में नियुक्त उनकी पत्नी ने भी उनका पूरा सहयोग किया।
पति की शूटिंग के प्रति लगन देखते हुए पत्नी कविता ने राकेश को किराए पर राइफल लेने के लिए प्रेरित किया और खुद के वेतन से किराया भी जुटाया। एेसी परिस्थिति के बावजूद राकेश ने हाल ही में गुडगांव में आयोजित प्री-नेशनल चैँपियनशिप में ऐसा निशाना साधा कि उनका चयन नेशनल चैंपियनशिप के लिए हो गया। अब राकेश का सपना है कि वे शूटिंग में अपने देश का नाम रोशन करे।
पत्नी ने किया प्रेरित, पूरा वेतन दिया
राकेश बताते हैं कि उनको शूटिंग के अभ्यास लिए पुलिस विभाग से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिली। विभाग की ओर से प्रैक्टिस के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है। ऐसे में उन्होंने खुद के स्तर पर ही तैयारी की। इस दौरान उनकी पत्नी का भी बहुत सहयोग मिला। एसबीआई बैंक में कार्यरत कविता ने अपना पूरा वेतन ही पति राकेश जाखड़ का सपना पूरा करने में लगा दिया।
नेशनल शूटिंग चैँपियनशिप में चयन होने के बाद अब राकेश 6 लाख रुपए तक के हथियार विदेशों से शूटिंग के लिए खरीद सकेंगे, जो भारत में नहीं मिलते हैं।

नेवरा के आजीवन सरपंच, न्याय प्रिय, पारदर्शी व्यक्तित्व एवं जन मानस के चहेते :- श्री चूनाराम जाखड़.

नेवरा के आजीवन सरपंच, न्याय प्रिय, पारदर्शी व्यक्तित्व एवं जन मानस के चहेते :- श्री चूनाराम जाखड़.
                                                              जाखड़ शिरोमणि दर्शन :-ओमप्रकाश बागड़वा
                                             दोहा
                              गंगाणी गुण माळ, राखी चौधर चून जी .
                             हीराणी हर माळ, माळा मांय सूमेर जी.

जोधपुर जिले की ओसियां तहसील का नेवरा गांव जाखड़ जाटों का ही नहीं, कई अन्य जातीय समुदायों का उद्गम अथवा उछाला स्थल रहा है. आस्था अथवा धार्मिक दृष्टी से भी नेवरा का विशेष महत्व है l
 गांव के पास ही कंवरा जी जाखड़ द्वारा स्थापित दादा जी का थड़ा है.
गांव नेवरा रोड़, जाखड़ों की ढाणियों के बीच मगाराम जी जाखड़ द्वारा स्थापित गोसाईं बाबा की शाळ जहां आज भी केशर पड़ती है और शाळ के समीप स्थित कई चमत्कारिक समाधियां स्थानीय जन समुदाय की अटूट आस्था का केन्द्र है.
जन नायक श्री जाखड़ के कीर्तिमान
श्री गंगाराम जाखड़ के घर केशु देवी पुत्री श्री पीराराम पौत्री श्री मोहनराम सियाग गांव नेवरा की पावन कोख से पुत्र चूनाराम, बलवंत राम और पुत्रियां जमना, पूरां, रूकी व मिरगां का जन्म हुआ. श्री चूनाराम जाखड़ का जन्म विक्रम संवत 1993 भादवा सुदी 13 को हुआ. विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री जाखड़ ने लग -भग 40 वर्षो तक नेवरा गांव का नेतृत्व किया l
न्याय प्रिय, पारदर्शी व्यक्तित्व एवं जन मानस के चहेते श्री चूनाराम जाखड़ ने पहला चुनाव सन् 1962 में जीता से लेकर तीन साल के अन्तराल को छोड़ कर सन् 1991 तक अनवरत सरपंच पद पर बने रहे.
सन् 1995 से सन् 2000 तक आपकी धर्म पत्नी श्री मति चूनी देवी नेवरा रोड़ नयी पंचायत की पहली महिला सरपंच बनने का श्रेय हासिल किया.
इस महामना का महाप्रयाण ... को हुआ. श्री चूनाराम जाखड़ का भव्य स्मर्ति स्थम्भ नेवरा रोड़ चौराहे पर स्थित है जो ग्रामिण जनों के लिए एक प्रेरणा पुंज है. लम्बे समय तक जन सेवक के रूप में कार्य करने के कारण एक बार फिर आपके मंझले पुत्र श्री देदाराम वर्तमान में सरपंच पद पर आसीन है l
श्री चूनाराम का विवाह चूनी देवी पुत्री श्री गोमद राम पौत्री श्री कोहला राम थोरी गांव रायमलवाड़ा के साथ हुआ. श्री चूनाराम के घर पुत्र ऊंमाराम, देदाराम, नरसिगा राम व पुत्रियां मींरा, कैलाश, मेकू और उषा का जन्म हुआ.

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

गोरक्षक लोक देवता वीर बिग्गा जी का मेला 13 अक्टूम्बर को


"आप सभी सपरिवार मेले में सादर आमंत्रित है"
रूघपत कुळ में ऊपन्यौ, भागीरथ वंस मांय।
मामा गोदारा भीम-सा नानौज चूहड़ नांव।।
माता देवी सुलतानवी, मेंहद पिता कौ नांव।
रिड़ीज गढ रौ पाटवी, परण्यौ मालां रै गांव।।
जरणी जायो अेकलौ, चढ्यौ गउवां घेरण लार।
कांकड़ कोस पैंतीस पर, जा पूग्यौ भड़ वार।।
मगर पचीसां हुवौ मोटियार।
सासरै जाय, चढ़या गउवां कै लार।।
छोटकी दाईं बजाई थैं वार।
हुवौ कुळ देव बडौ जूंझार।।
हुवौ न को होसी इसौ कोई जाट।
बुवौ न को बैसी लखावट वाट।।
कंचन सेती देवळी, सब जुग लेसी नांव।
रिड़वी गढ रौ पाटवी, कियौ बिगै नै धांम।।
                                                                              

-अत्यन्त हर्ष और उल्लास के साथ सूचित किया जाता है कि लोक देवता वीर बिग्गाजी का दो दिवसिय मेला 13अक्टूम्बर से जन्म स्थान व शीश देवली धाम रीड़ी एवं धड़ देवली धाम श्री बिग्गा में आयोजित होगा . इस दौरान विशाल रात्री जागरण दिनांक 13 अक्टुम्बर की शाम को तथा भव्य मेला 14 अक्टुम्बर को आयोजित होगा , जिसमें आप सभी सादर आमन्त्रित है I
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निवेदक :- श्री वीर बिग्गाजी मानव सेवा संस्थान (रजि.)
वीर बिग्गाजी का मन्दिर ग्राम-श्री बिग्गा ,तह.-श्री डूँगरगढ (बीकानेर)

पुलिस की ओर से हर साल चढ़ायी जाती है अलोद के वीर तेजाजी मेले में ध्वजा


बूंदी जिले की दबलाना थाना पुलिस हर साल अलोद के पशु मेले में तेजाजी को ध्वजा चढ़ाती है।पिछले करीब चालीस साल से यह परम्परा नियमित जारी है।
अलोद में पशु मेले की शुरुआत के मौके पर दबलाना थाना पुलिस की ओर से तेजाजी को गाजे-बाजे के साथ ध्वजा चढ़ाई जाती हैं । 
सुबह वीर तेजाजी अलोद मेले के लिए ध्वजा को पूजा अर्चना होने के बाद डीजे के साथ रवाना किया जाता हैं ।
मंदिर निर्माण रोका तो छाती पर आ बैठे
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1976 में अलोद में तेजाजी का मंदिर बनाया जा रहा था। इसका गांव के कुछ लोगों ने विरोध किया।
उन लोगों की ओर से दबलाना थाने में रिपोर्ट आई। जिस पर पुलिस ने मंदिर का काम बंद करा दिया।
दूसरे दिन रात को जब थानेदार सो रहे थे, उसी समय तेजाजी नाग के रूप में आकर थानेदार के ऊपर बैठ गए। दूसरे दिन थाने के चारों तरफ नाग ही नाग हो गए। ऐसा दो दिनों तक चला। इसके बाद थानेदार ने खुद अलोद जाकर तेजाजी का मंदिर बनवाया और सर्वप्रथम पुलिस थाने की तरफ से मंदिर में ध्वजा चढाई।
वे मंदिर से यह प्रण लेकर आए कि अब हर वर्ष सर्वप्रथम थाने की तरफ से ध्वजा चढ़ेगी। उस दिन के बाद से हर वर्ष सर्वप्रथम थाने की ध्वजा तेजाजी को चढाई जाती हैं।


तोड़ी परम्परा तो नागों ने थाने को घेरा
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1996-97 में थानेदार ने ध्वजा नहीं चढ़ाई थी। उस समय भी थाने के चारों तरफ नाग ही नाग हो गए थे। दूसरे दिन थानेदार ध्वजा लेकर खुद पैदल गए और तेजाजी को धोक लगाकर माफी मांगी। मान्यता है कि हर वर्ष ध्वजा चढाने से तेजाजी थाने व पुलिसकर्मियों की रक्षा करते हैं।

लोक देवता गो रक्षक वीर बिग्गा जी का मेला 13 अक्टूम्बर से


बीकानेर - लोक देवता वीर बिग्गा जी का दो दिवसीय मेला शीश देवली धाम रीड़ी व धड़ देवली धाम श्री बिग्गा में 13 व 14 अक्टूम्बर को आयोजित होगा l शीश देवली धाम रीड़ी में वीर बिग्गा जी नव युवक मंडल व धड़ देवली धाम श्री बिग्गा में वीर बिग्गा जी मानव सेवा संस्थान के कार्यकर्ता मेले की तैयारियां में लगे हुए हैं l श्रद्धालुओं का आवागमन शुरु हो चुका हैं l मेले में आने वाले जातरूओं के लिए निःशुल्क चिकित्सा सेवा का केम्प लगाया गया हैं l